
चरणं हवइ सधम्मो धम्मो सो हवइ अप्पसमभावो
सो रागरोसरहिओ जीवस्स अणण्णपरिणामो ॥50॥
चरणं भवति स्वधर्मः धर्मः सः भवति आत्मसमभावः
सः रागरोषरहितः जीवस्य अनन्यपरिणामः ॥५०॥
चारित्र ही निजधर्म है अर धर्म आत्मस्वभाव है ।
अनन्य निज परिणाम वह ही राग-द्वेष विहीन है ॥५०॥
अन्वयार्थ : [चरणं] चारित्र [हवइ सधम्मो] स्वधर्म है, [धम्मो] धर्म [सो] वह [अप्पसमभावो] आत्मा का समभाव [हवइ] है, [सो] वह [रागरोसरहिओ] रागद्वेष रहित [जीवस्स] जीव का [अणण्णपरिणामो] अनन्य परिणाम है ।
जचंदछाबडा
जचंदछाबडा :
चारित्र है वह ज्ञानमें रागद्वेष रहित निराकुलतारूप स्थिरताभाव है, वह जीव का ही अभेदरूप परिणाम है, कुछ अन्य वस्तु नहीं है ॥५०॥
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