
जह फलिहमणि विसुद्धो परदव्वजुदो हवेइ अण्णं सो
तह रागादिविजुत्तो जीवो हवदि हु अणण्णविहो ॥51॥
यथा स्फटिकमणिः विशुद्धः परद्रव्ययुतः भवत्यन्यः सः
तथा रागादिवियुक्तः जीवः भवति स्फुटमन्यान्यविधः ॥५१॥
फटिकमणिसम जीव शुध पर अन्य के संयोग से ।
वह अन्य-अन्य प्रतीत हो, पर मूलत: है अनन्य ही ॥५१॥
अन्वयार्थ : [जह] जैसे [फलिहमणि] स्फटिक-मणि [विसुद्धो] विशुद्ध है, [सो] वह [परदव्वजुदो] पर-द्रव्य से युक्त होने पर [अण्णं] अन्य सा [हवेइ] होता है, [तह] वैसे ही [हु] स्पष्ट रूप से [जीवो] जीव [रागादिविजुत्तो] रागादिक भावों से युक्त होने पर [अणण्णविहो] अन्य-अन्य प्रकार [हवदि] होता है ।
जचंदछाबडा
जचंदछाबडा :
यहाँ ऐसा जानना कि रागादि विकार हैं वह पुद्गल के हैं और ये जीव के ज्ञान में आकर झलकते हैं तब उनसे उपयुक्त होकर इसप्रकार जानता है कि ये भाव मेरे ही है, जब तक इनका भेद-ज्ञान नहीं होता है तब तक जीव अन्य-अन्य प्रकार रूप अनुभव में आता है । यहाँ स्फटिक-मणि का दृष्टांत है, उसके अन्य-द्रव्य / पुष्पादिक का डांक लगता है तब अन्य सा दिखता है, इस प्रकार जीव के स्वच्छ भाव की विचित्रता जानना ॥५१॥
|