
दुक्खे णज्जइ अप्पा अप्पा णाऊण भावणा दुक्खं
भावियसहावपुरिसो विसयेसु विरज्जए दुक्खं ॥65॥
दुःखेन ज्ञायते आत्मा आत्मानं ज्ञात्वा भावना दुःखम्
भावितस्वभावपुरुषः विषयेषु विरज्यति दुःखम् ॥६५॥
आत्मा का जानना भाना व करना अनुभवन ।
तथा विषयों से विरक्ति उत्तरोत्तर है कठिन ॥६५॥
अन्वयार्थ : [अप्पा] आत्मा का [णज्जइ] जानना [दुक्खे] दुःख से होता है, फिर [अप्पा] आत्मा को [णाऊण] जानकर भी [भावणा] भावना [दुक्खं] दुःख से होती है, [सहावपुरिसो] आत्म-स्वभाव की [भाविय] भावना होने पर भी [विसयेसु] विषयों से [विरज्जए] विरक्त बड़े [दुक्खं] दुःख से होता है ।
जचंदछाबडा
जचंदछाबडा :
आत्मा का जानना, भाना, विषयों से विरक्त होना उत्तरोत्तर यह योग मिलना बहुत दुर्लभ है, इसलिये यह उपदेश है कि ऐसा सुयोग मिलने पर प्रमादी न होना ॥६५॥
|