
जचंदछाबडा :
जीव के स्वभाव के उपयोग की ऐसी स्वच्छता है कि जो जिस ज्ञेय पदार्थ से उपयुक्त होता है वैसा ही हो जाता है, इसलिये आचार्य कहते हैं कि-जब तक विषयों में चित्त रहता है, तब तक उनरूप रहता है, आत्मा का अनुभव नहीं होता है, इसलिये योगी मुनि इस प्रकार विचार कर विषयों से विरक्त हो आत्मा में उपयोग लगावे तब आत्मा को जाने, अनुभव करे, इसलिये विषयों से विरक्त होना यह उपदेश है ॥६६॥ |