
जे पुण विसयविरत्ता अप्पा णाऊण भावणासहिया
छंडंति चाउरंगं तवगुणजुत्ता ण संदेहो ॥68॥
ये पुनः विषयविरक्ताः आत्मानं ज्ञात्वा भावनासहिताः
त्यजन्ति चातुरंगं तपोगुणयुक्ताः न संदेहः ॥६८॥
अरे विषय विरक्त हो निज आतमा को जानकर ।
जो तपोगुण से युक्त हों वे चतुर्गति से मुक्त हों ॥६८॥
अन्वयार्थ : [जे पुण] फिर जो [विसयविरत्ता] विषयों से विरक्त हो [अप्पा णाऊण] आत्मा को जानकर, [भावणासहिया] बारंबार भावना द्वारा , [तवगुणजुत्ता] तप और मूलगुण-उत्तरगुणों से युक्त होकर [चाउरंगं] संसार को [छंडंति] छोड़ते हैं, [ण संदेहो] इसमें कोई संदेह नहीं है ।
जचंदछाबडा
जचंदछाबडा :
विषयों से विरक्त हो आत्मा को जानकर भावना करना, इससे संसार से छूटकर मोक्ष प्राप्त करो, यह उपदेश है ॥६८॥
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