+ पर-द्रव्य में लेशमात्र भी राग हो तो वह अज्ञानी -
परमाणुपमाणं वा परदव्वे रदि हवेदि मोहादो
सो मूढो अण्णाणी आदसहावस्स विवरीओ ॥69॥
परमाणुप्रमाणं वा परद्रव्ये रतिर्भवति मोहात्
सः मूढः अज्ञानी आत्मस्वभावात् विपरीतः ॥६९॥
यदि मोह से पर द्रव्य में रति रहे अणु प्रमाण में ।
विपरीतता के हेतु से वे मूढ़ अज्ञानी रहें ॥६९॥
अन्वयार्थ : [परमाणुपमाणं वा] परमाणु प्रमाण (लेशमात्र) भी [परदव्वे] पर-द्रव्य में [मोहादो] मोह द्वारा [रदि] रति (राग / प्रीति) [हवेदि] हो तो [सो मूढो अण्णाणी] वह पुरुष मूढ है, अज्ञानी है, [आदसहावस्स] आत्म-स्वभाव से [विवरीओ] विपरीत है ।

  जचंदछाबडा 

जचंदछाबडा :

भेद-विज्ञान होने के बाद जीव-अजीव को भिन्न जाने तब पर-द्रव्य को अपना न जाने तब उससे राग भी नहीं होता है, यदि (ऐसा) हो तो जानो कि इसने स्व-पर का भेद नहीं जाना है, अज्ञानी है, आत्म-स्वभाव से प्रतिकुल है; और ज्ञानी होने के बाद चारित्र-मोह का उदय रहता है तब तक कुछ राग रहता है उसको कर्म-जन्य अपराध मानता है, उस राग से राग नहीं है इसलिये विरक्त ही है, अतः ज्ञानी पर-द्रव्य में रागी नहीं कहलाता है, इसप्रकार जानना ॥६९॥