
जचंदछाबडा :
भेद-विज्ञान होने के बाद जीव-अजीव को भिन्न जाने तब पर-द्रव्य को अपना न जाने तब उससे राग भी नहीं होता है, यदि (ऐसा) हो तो जानो कि इसने स्व-पर का भेद नहीं जाना है, अज्ञानी है, आत्म-स्वभाव से प्रतिकुल है; और ज्ञानी होने के बाद चारित्र-मोह का उदय रहता है तब तक कुछ राग रहता है उसको कर्म-जन्य अपराध मानता है, उस राग से राग नहीं है इसलिये विरक्त ही है, अतः ज्ञानी पर-द्रव्य में रागी नहीं कहलाता है, इसप्रकार जानना ॥६९॥ |