+ राग संसार का कारण होने से योगीश्वर आत्मा में भावना करते हैं -
जेण रागो परे दव्वे संसारस्स हि कारणं
तेणावि जोइणो णिच्चं कुज्जा अप्पे सभावणं ॥71॥
येन रागः परे द्रव्ये संसारस्य हि कारणम्
तेनापि योगी नित्यं कुर्यात् आत्मनि स्वभावनाम् ॥७१॥
पर द्रव्य में जो राग वह संसार कारण जानना ।
इसलिये योगी करें नित निज आतमा की भावना ॥७१॥
अन्वयार्थ : [जेण] क्योंकि [परे दव्वे] पर-द्रव्य में [रागो] राग है वह [संसारस्स हि कारणं] संसार ही का कारण है, [तेणावि] इसलिए [जोइणो] योगीश्वर मुनि [णिच्चं] नित्य [अप्पे सभावणं] आत्म की भावना [कुज्जा] करते हैं ।

  जचंदछाबडा 

जचंदछाबडा :

कोई ऐसी आशंका करते हैं कि -- पर-द्रव्य में राग करने से क्या होता है ? पर-द्रव्य है वह पर है ही, अपने राग जिस काल हुआ उस काल है, पीछे मिट जाता है, उसको उपदेश दिया है कि -- पर-द्रव्य से राग करने पर पर-द्रव्य अपने साथ लगता है, यह प्रसिद्ध है, और अपने राग का संस्कार दृढ़ होता है तब परलोक तक भी चला जाता है यह तो युक्ति-सिद्ध है और जिनागम में राग से कर्म का बंध कहा है, इसका उदय अन्य जन्म का कारण है, इस प्रकार पर-द्रव्य में राग से संसार होता है, इसलिये योगीश्वर मुनि पर-द्रव्य से राग छोड़कर आत्मा में निरंतर भावना रखते हैं ॥७१॥