+ रागद्वेष से रहित ही चारित्र होता है -
णिंदाए य पसंसाए दुक्खे य सुहएसु य
सत्तूणं चेव बंधूणं चारित्तं समभावदो ॥72॥
निंदायां च प्रशंसायां दुःखे च सुखेषु च
शत्रूणां चैव बंधूनां चारित्रं समभावतः ॥७२॥
निन्दा-प्रशंसा दुक्ख-सुख अर शत्रु-बंधु-मित्र में ।
अनुकूल अर प्रतिकूल में समभाव ही चारित्र है ॥७२॥
अन्वयार्थ : [णिंदाए य पसंसाए] निन्दा और प्रशंसा में, [दुक्खे य सुहएसु य] दुःख और सुख में और [सत्तूणं चेव बंधूणं] शत्रु और मित्र में [समभावदो] समभाव (समतापरिणाम), [चारित्तं] चारित्र होता है ।

  जचंदछाबडा 

जचंदछाबडा :

चारित्र का स्वरूप यह कहा है कि जो आत्मा का स्वभाव है वह कर्म के निमित्त से ज्ञान में पर-द्रव्य में इष्ट अनिष्ट-बुद्धि होती है, इस इष्ट-अनिष्ट बुद्धि के अभाव से ज्ञान ही में उपयोग लगा रहे उसको शुद्धोपयोग कहते हैं, वही चारित्र है, यह होता है वहाँ निंद्रा-प्रशंसा, दुःख-सुख, शत्रु-मित्र में समान बुद्धि होती है, निंदा-प्रशंसा का द्विधाभाव मोह-कर्म का उदय-जन्य है, इसका अभाव ही शुद्धोपयोगरूप चारित्र है ॥७२॥