
जचंदछाबडा :
चारित्र का स्वरूप यह कहा है कि जो आत्मा का स्वभाव है वह कर्म के निमित्त से ज्ञान में पर-द्रव्य में इष्ट अनिष्ट-बुद्धि होती है, इस इष्ट-अनिष्ट बुद्धि के अभाव से ज्ञान ही में उपयोग लगा रहे उसको शुद्धोपयोग कहते हैं, वही चारित्र है, यह होता है वहाँ निंद्रा-प्रशंसा, दुःख-सुख, शत्रु-मित्र में समान बुद्धि होती है, निंदा-प्रशंसा का द्विधाभाव मोह-कर्म का उदय-जन्य है, इसका अभाव ही शुद्धोपयोगरूप चारित्र है ॥७२॥ |