+ पंचमकाल आत्मध्यान का काल नहीं है, उसका निषेध -
चरियावरिया वदसमिदिवज्जिया सुद्धभावपब्भट्ठा
केई जंपंति णरा ण हु कालो झाणजोयस्स ॥73॥
सम्मत्तणाणरहिओ अभव्वजीवो हु मोक्खपरिमुक्को
संसारसुहे सुरदो ण हु कालो भणइ झाणस्स ॥74॥
चर्यावृताः व्रतसमितिवर्जिताः शुद्धभावप्रभ्रष्टाः
केचित् जल्पंति नराः न स्फुटं कालः ध्यानयोगस्य ॥७३॥
सम्यक्त्वज्ञानरहितः अभव्यजीवः स्फुटं मोक्षपरिमुक्तः
संसारसुखे सुरतः न स्फुटं कालः भणति ध्यानस्य ॥७४॥
जिनके नहीं व्रत-समिति चर्या भ्रष्ट हैं शुधभाव से ।
वे कहें कि इस काल में निज ध्यान योग नहीं बने ॥७३॥
जो शिवविमुख नर भोग में रत ज्ञानदर्शन रहित हैं ।
वे कहें कि इस काल में निज ध्यान-योग नहीं बने ॥७४॥
अन्वयार्थ : [चरियावरिया] चर्या (आचारक्रिया) आवृत / अप्रकट, [वदसमिदिवज्जिया] व्रत-समिति से रहित और [सुद्धभावपब्भट्ठा] शुद्धभाव से अत्यंत भ्रष्ट [केई जंपंति णरा] कई मनुष्य ऐसा कहते हैं कि (पंचमकाल) [झाणजोयस्स] ध्यान-योग [ण हु कालो] का काल ही नहीं है ।
[सम्मत्तणाणरहिओ] सम्यक्त्व और ज्ञान से रहित, [अभव्वजीवो] अभव्य-जीव, [हु मोक्खपरिमुक्को] स्पष्ट रूप से मोक्ष से विपरीत, [संसारसुहे] संसार-सुख में [सुरदो] अच्छी तरह रत (आसक्त) कहते हैं कि [ण हु कालो भणइ झाणस्स] अभी ध्यान का काल नहीं है ।

  जचंदछाबडा 

जचंदछाबडा :

कई मनुष्य ऐसे हैं जिनके चर्या अर्थात् आचारक्रिया आवृत है, चारित्रमोह का उदय प्रबल है इससे चर्या प्रकट नहीं होती है, इसी से व्रतसमिति से रहित हैं और मिथ्या अभिप्राय के कारण शुद्धभाव से अत्यंत भ्रष्ट हैं, वे ऐसे कहते हैं कि-अभी पंचमकाल है, यह काल प्रकट ध्यान--योग का नहीं है ॥७३॥

जिसको इन्द्रियों के सुख ही प्रिय लगते हैं और जीवाजीव पदार्थ के श्रद्धान-ज्ञान से रहित है, वह इस प्रकार कहता है कि अभी ध्यान का काल नहीं है । इससे ज्ञात होता है कि इस प्रकार कहनेवाला अभव्य है इसको मोक्ष नहीं होगा ॥७४॥