
जे पावमोहियमई लिंग घेत्तूण जिणवरिंदाणं
पावं कुणंति पावा ते चत्ता मोक्खमग्गम्मि ॥78॥
ये पापमोहितमतयः लिंगं गृहीत्वा जिनवरेन्द्राणाम्
पापं कुर्वन्ति पापाः ते त्यक्त्वा मोक्षमार्गे ॥७८॥
जिन लिंग धर कर पाप करते पाप मोहितमति जो ।
वे च्युत हुए हैं मुक्तिमग से दुर्गति दुर्मति हो ॥७८॥
अन्वयार्थ : [जे] जिनकी [पावमोहियमई] पाप से मोहित बुद्धि है वे [जिणवरिंदाणं] जिनवरेन्द्र का [लिंग घेत्तूण] लिंग ग्रहण करके भी [पावं कुणंति] पाप करते हैं, [पावा ते] वे पापी [मोक्खमग्गम्मि] मोक्षमार्ग से [चत्ता] च्युत हैं ।
जचंदछाबडा
जचंदछाबडा :
जिन्होंने पहिले निर्ग्रंथ लिंग धारण कर लिया और पीछे ऐसी पापबुद्धि उत्पन्न हो गई कि -- अभी ध्यान का काल तो नहीं इसलिये क्यों प्रयास करें ? ऐसा विचारकर पाप में प्रवृत्ति करने लग जाते हैं वे पापी हैं, उनको मोक्षमार्ग नहीं है ॥७२॥
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