+ मोक्षमार्ग से च्युत वे कैसे हैं -
जे पंचचेलसत्ता गंथग्गाही य जायणासीला
आधाकम्मम्मि रया ते चत्ता मोक्खमग्गम्मि ॥79॥
ये पंचचेलसक्ताः ग्रंथग्राहिणः याचनाशीलाः
अधः कर्मणि रताः ते त्यक्ताः मोक्षमार्गे ॥७९॥
हैं परिग्रही अध:कर्मरत आसक्त जो वस्त्रादि में ।
अर याचना जो करें वे सब मुक्तिमग से बाह्य हैं ॥७९॥
अन्वयार्थ : [जे] जो [पंचचेलसत्ता] पांच प्रकार के वस्त्रों (अंडज, कर्पासज, वल्कल, चर्मज और रोमज) में आसक्त, [गंथग्गाही] परिग्रह धारी [य] और [जायणासीला] मांगने का ही जिनका स्वभाव है [आधाकम्मम्मि रया] पाप-कर्म में रत हैं, [ते चत्ता मोक्खमग्गम्मि] वे मोक्षमार्ग से च्युत हैं ।

  जचंदछाबडा 

जचंदछाबडा :

यहाँ आशय ऐसा है कि पहिले तो निर्ग्रंथ दिगम्बर मुनि ही गये थे, पीछे काल-दोष का विचारकर चारित्र पालने में असमर्थ हो निर्ग्रंथ लिंग से भ्रष्ट होकर वस्त्रादिक अंगीकार कर लिये, परिग्रह रखने लगे, याचना करने लगे, अधःकर्म औद्देशिक आहार करने लगे उनका निषेध है वे मोक्षमार्ग से च्युत हैं । पहिले तो भद्रबाहु स्वामी तक निर्ग्रंथ थे । पीछे दुर्भिक्ष-काल में भ्रष्ट होकर जो अर्द्धफालक कहलाने लगे उनमें से श्वेताम्बर हुए, इन्होंने इस भेष को पुष्ट करने के लिये सूत्र बनाये, इनमें कई कल्पित आचरण तथा इनकी साधक कथायें लिखीं । इनके सिवाय अन्य भी कई भेष बदले, इसप्रकार काल-दोष से भ्रष्ट लोगों का संप्रदाय चल रहा है यह मोक्षमार्ग नहीं है, इसप्रकार बताया है । इसलिये इन भ्रष्ट लोगों को देखकर ऐसा भी मोक्षमार्ग है, ऐसा श्रद्धान न करना ॥७९॥