
णिग्गंथमोहमुक्का बावीसपरीसहा जियकसाया
पावारंभविमुक्का ते गहिया मोक्खमग्गम्मि ॥80॥
निर्ग्रंथाः मोहमुक्ताः द्वाविंशतिपरीषहाः जितकषायाः
पापारंभविमुक्ताः ते गृहीताः मोक्षमार्गे ॥८०॥
रे मुक्त हैं जो जितकषायी पाप के आरंभ से ।
परिषहजयी निर्ग्रंथ वे ही मुक्तिमारग में कहे ॥८०॥
अन्वयार्थ : [णिग्गंथ] निर्ग्रंथ , [मोहमुक्का] मोह-रहित, [बावीसपरीसहा] बाईस परीषहों को सहने वाले, [जियकसाया] कषायों को जिनने जीत लिया और [पावारंभविमुक्का] आरंभादिक पापों में नहीं प्रवर्तते [ते] उन्हें [मोक्खमग्गम्मि] मोक्षमार्ग में [गहिया] ग्रहण किया है ।
जचंदछाबडा
जचंदछाबडा :
मुनि हैं वे लौकिक कष्टों और कार्यों से रहित हैं । जैसा जिनेश्वरदेव ने मोक्षमार्ग बाह्य-अभ्यंतर परिग्रह से रहित नग्न दिगम्बर-रूप कहा है वैसे ही प्रवर्तते हैं वे ही मोक्षमार्गी हैं, अन्य मोक्षमार्गी नहीं है ॥८०॥
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