+ निश्चयनय से ध्यान इस प्रकार करना -
णिच्छयणयस्स एवं अप्पा अप्पम्मि अप्पणे सुरदो
सो होदि हु सुचरित्तो जोई सो लहइ णिव्वाणं ॥83॥
निश्चयनयस्य एवं आत्मा आत्मनि आत्मने सुरतः
सः भवति स्फुटं सुचरित्रः योगी सः लभते निर्वाणम् ॥८३॥
निज-द्रव्यरत यह आतमा ही योगि चारित्रवंत है ।
यह ही बने परमातमा परमार्थनय का कथन यह ॥८३॥
अन्वयार्थ : [णिच्छयणयस्स एवं] निश्चयनय के मत से [अप्पा] आत्मा [अप्पम्मि] आत्मा ही में [अप्पणे] अपने ही लिये [सुरदो] भले प्रकार रत (लीन) हो जावे [सो] वह [हु] स्पष्ट रूप से [सुचरित्तो] सम्यक्चारित्रवान् [जोई] योगी (मुनि) [होदि] होता हुआ [सो लहइ णिव्वाणं] वह निर्वाण को पाता है ।

  जचंदछाबडा 

जचंदछाबडा :

निश्चयनय का स्वरूप ऐसा है कि-एक द्रव्य की अवस्था जैसी हो उसी को कहे । आत्मा की दो अवस्थायें हैं -- एक तो अज्ञान-अवस्था और एक ज्ञान-अवस्था । जबतक अज्ञान-अवस्था रहती है तबतक तो बंध-पर्याय को आत्मा जानता है कि -- मैं मनुष्य हूँ, मैं पशु हूँ, मैं क्रोधी हूँ, मैं मानी हूँ, मैं मायावी हूँ, मैं पुण्यवान्-धनवान् हूँ, मैं निर्धन-दरिद्री हूँ, मैं राजा हूँ, मैं रंक हूँ, मैं मुनि हूँ, मैं श्रावक हूँ इत्यादि पर्यायों में आपा मानता है, इन पर्यायों में लीन होता है तब मिथ्यादृष्टि है, अज्ञानी है, इसका फल संसार है उसको भोगता है ।

जब जिनमत के प्रसाद से जीव-अजीव पदार्थों का ज्ञान होता है तब स्व-पर का भेद जानकर ज्ञानी होता है, तब इस प्रकार जानता है कि -- मैं शुद्ध ज्ञान-दर्शनमयी चेतना-स्वरूप हूँ अन्य मेरा कुछ भी नहीं है । जब भावलिंगी निर्ग्रंथ मुनिपद की प्राप्ति करता है तब यह आत्माही में अपने ही द्वारा अपने ही लिये विशेष लीन होता है तब निश्चय-सम्यक्चारित्र-स्वरूप होकर अपना ही ध्यान करता है, तब ही (साक्षात् मोक्षमार्ग में आरूढ़) सम्यग्ज्ञानी होता है, इसका फल निर्वाण है, इसप्रकार जानना चाहिये ॥८३॥