
पुरिसायारो अप्पा जोई वरणाणदंसणसमग्गो
जो झायदि सो जोई पावहरो हवदि णिद्दंदो ॥84॥
पुरुषाकार आत्मा योगी वरज्ञानदर्शनसमग्रः
यः ध्यायति सः योगी पापहरः भवति निर्द्वन्द्वः ॥८४॥
ज्ञानदर्शनमय अवस्थित पुरुष के आकार में ।
ध्याते सदा जो योगि वे ही पापहर निर्द्वन्द हैं ॥८४॥
अन्वयार्थ : [पुरिसायारो] पुरुषाकार [अप्पा] आत्मा [जोई] योगी है और [वरणाणदंसणसमग्गो] श्रेष्ठ सम्यकरूप ज्ञान तथा दर्शन से समग्र है / परिपूर्ण है इसप्रकार जो [झायदि] ध्यान करता है [सो] वह [जोई] योगी [पावहरो] पाप को हरता है और [णिद्दंदो] निर्द्वन्द्व [हवदि] है ।
जचंदछाबडा
जचंदछाबडा :
जो अरहंतरूप शुद्ध-आत्मा का ध्यान करता है उसके पूर्व-कर्म का नाश होता है और वर्तमान में राग-द्वेष रहित होता है तब आगामी कर्म को नहीं बाँधता है ॥८४॥
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