
किं काहिदि बहिकम्मं किं काहिदि बहुविहं च खवणं तु
किं काहिदि आदावं आदसहावस्स विवरीदो ॥99॥
जदि पढदि बहु सुदाणि य जदि काहिदि बहुविहं च चारित्तं
तं बालसुदं चरणं हवेइ अप्पस्स विवरीदं ॥100॥
किं करिष्यति बहिः कर्म किं करिष्यति बहुविधं च क्षमणं तु
किं करिष्यति आतापः आत्मस्वभावात् विपरीतः ॥९९॥
यदि पठति बहुश्रुतानि च यदि करिष्यति बहुविध च चारित्रं
तत् बालश्रुतं चरणं भवति आत्मनः विपरीतम् ॥१००॥
आत्मज्ञान बिना विविध-विध विविध क्रिया-कलाप सब ।
और जप-तप पद्म-आसन क्या करेंगे आत्महित ॥९९॥
यदि पढ़े बहुश्रुत और विविध क्रिया-कलाप करे बहुत ।
पर आत्मा के भान बिन बालाचरण अर बालश्रुत ॥१००॥
अन्वयार्थ : [आदसहावस्स विवरीदो] आत्म-स्वभाव से विपरीत को [किं काहिदि बहिकम्मं] बाह्यकर्म क्या करेगा ? [किं काहिदि बहुविहं च खवणं तु] बहुत अनेक प्रकार श्रमण अर्थात् उपवासादि बाह्य तप भी क्या करेगा ? [किं काहिदि आदावं] आतापनयोग आदि कायक्लेश क्या करेगा ?
[अप्पस्स विवरीदं] आत्म-स्वभाव से विपरीत [जदि पढदि बहु सुदाणि] यदि बहुत शास्त्रों को पढ़े [य] और [जदि काहिदि बहुविहं च चारित्तं] यदि बहुत प्रकार के चारित्र का आचरण करे तो [तं बालसुदं चरणं] वह सब ही बाल-श्रुत और बाल-चारित्र [हवेइ] होता है ।
जचंदछाबडा
जचंदछाबडा :
बाह्य क्रिया-कर्म शरीराश्रित है और शरीर जड़ है, आत्मा चेतन है, जड़ की क्रिया तो चेतन को कुछ फल करती नहीं है, जैसा चेतना का भाव जितना क्रिया में मिलता है उसका फल चेतन को लगता है । चेतन का अशुभ-उपयोग मिले तब अशुभ-कर्म बँधे और शुभ-उपयोग मिले तब शुभ-कर्म बँधता है और जब शुभ-अशुभ दोनों से रहित उपयोग होता है तब कर्म नहीं बँधता है, पहिले बँधे हुए कर्मों की निर्जरा करके मोक्ष करता है । इस प्रकार चेतना उपयोग के अनुसार फलती है, इसलिये ऐसे कहा है कि बाह्य क्रिया-कर्म से तो कुछ मोक्ष होता नहीं है, शुद्ध-उपयोग होने पर मोक्ष होता है । इसलिये दर्शन-ज्ञान उपयोगों का विकार मेटकर शुद्ध-ज्ञानचेतना का अभ्यास करना मोक्ष का उपाय है ॥९९॥
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