
जचंदछाबडा :
ऐसा साधु उत्तम स्थान जो मोक्ष उसकी प्राप्ति करता है अर्थात् जो साधु वैराग्य में तत्पर हो संसार-देह-भोगों से पहिले विरक्त होकर मुनि हुआ उसी भावना युक्त हो, पर-द्रव्य से पराङ्मुख हो, जैसे वैराग्य हुआ वैसे ही पर-द्रव्य का त्यागकर उससे पराङ्मुख रहे, संसार संबंधी इन्द्रियों के द्वारा विषयों से सुख सा होता है उससे विरक्त हो, अपने आत्मीक शुद्ध अर्थात् कषायों के क्षोभ से रहित निराकुल, शांतभावरूप ज्ञानानन्द में अनुरक्त हो, लीन हो, बारंबार उसीकी भावना रहे । जिसका आत्म-प्रदेशरूप अंग गुण से विभूषित हो, जो मूलगुण, उत्तरगुणों से आत्मा को अलंकृत / शोभायमान किये हो, जिसके हेय-उपादेय तत्त्व का निश्चय हो, निज आत्म-द्रव्य तो उपादेय है और ऐसा जिसके निश्चय हो कि -- अन्य पर-द्रव्य के निमित्त से कहे हुए अपने विकारभाव ये सब हेय हैं । साधु होकर आत्मा के स्वभाव के साधने में भलीभाँति तत्पर हो, धर्म-शुक्ल ध्यान और अध्यात्म शास्त्रों को पढ़कर ज्ञान की भावना में तत्पर हो, सुरत हो, भले प्रकार लीन हो । ऐसा साधु उत्तम स्थान जो लोक-शिखर पर सिद्ध-क्षेत्र तथा मिथ्यात्व आदि चौदह गुणस्थानों से परे शुद्ध-स्वभावरूप मोक्ष-स्थान को पाता है । |