+ ऐसा साधु मोक्ष पाता है -
वेरग्गपरो साहू परदव्वपरम्मुहो य जो होदि
संसारसुहविरत्तो सगसुद्धसुहेसु अणुरत्तो ॥101॥
गुणगणविहूसियंगो हेयोपादेयणिच्छिदो साहू
झाणज्झयणे सुरदो सो पावइ उत्तमं ठाणं ॥102॥
वैराग्यपरः साधुः परद्रव्यपराङ्मुखश्च यः भवति
संसारसुखविरक्तः स्वकशुद्धसुखेषु अनुरक्तः ॥१०१॥
गुणगणविभूषितांगः हेयोपादेयनिश्चितः साधुः
ध्यानाध्ययने सुरतः सः प्राप्नोति उत्तमं स्थानम् ॥१०२॥
निजसुख निरत भवसुख विरत परद्रव्य से जो परान्मुख ।
वैराग्य तत्पर गुणविभूषित ध्यान धर अध्ययन सुरत ॥१०१॥
आदेय क्या है हेय क्या - यह जानते जो साधुगण ।
वे प्राप्त करते थान उत्तम जो अनन्तानन्दमय ॥१०२॥
अन्वयार्थ : [वेरग्गपरो] वैराग्य में तत्पर [य] और [परदव्वपरम्मुहो जो होदि] पर-द्रव्य से पराङ्मुख होता है वह [साहु] साधु [संसारसुहविरत्तो] संसार-सुख से विरक्त हो, [सगसुद्धसुहेसु] अपने आत्मीक शुद्ध (कषायों के क्षोभ से रहित) सुख में [अणुरत्तो] अनुरक्त (लीन) होता है ।
जो [साहू] साधु [गुणगणविहूसियंगो] मूलगुण, उत्तरगुणों से आत्मा को अलंकृत / शोभायमान किये हो, [हेयोपादेयणिच्छिदो] हेय-उपादेय तत्त्व का निश्चय हो, [झाणज्झयणे] ध्यान और अध्यन में [सुरदो] भली प्रकार लीन [सो पावइ उत्तमं ठाणं] वह उत्तम-स्थान (मोक्ष) पाता है ।

  जचंदछाबडा 

जचंदछाबडा :

ऐसा साधु उत्तम स्थान जो मोक्ष उसकी प्राप्ति करता है अर्थात् जो साधु वैराग्य में तत्पर हो संसार-देह-भोगों से पहिले विरक्त होकर मुनि हुआ उसी भावना युक्त हो, पर-द्रव्य से पराङ्मुख हो, जैसे वैराग्य हुआ वैसे ही पर-द्रव्य का त्यागकर उससे पराङ्मुख रहे, संसार संबंधी इन्द्रियों के द्वारा विषयों से सुख सा होता है उससे विरक्त हो, अपने आत्मीक शुद्ध अर्थात् कषायों के क्षोभ से रहित निराकुल, शांतभावरूप ज्ञानानन्द में अनुरक्त हो, लीन हो, बारंबार उसीकी भावना रहे ।

जिसका आत्म-प्रदेशरूप अंग गुण से विभूषित हो, जो मूलगुण, उत्तरगुणों से आत्मा को अलंकृत / शोभायमान किये हो, जिसके हेय-उपादेय तत्त्व का निश्चय हो, निज आत्म-द्रव्य तो उपादेय है और ऐसा जिसके निश्चय हो कि -- अन्य पर-द्रव्य के निमित्त से कहे हुए अपने विकारभाव ये सब हेय हैं । साधु होकर आत्मा के स्वभाव के साधने में भलीभाँति तत्पर हो, धर्म-शुक्ल ध्यान और अध्यात्म शास्त्रों को पढ़कर ज्ञान की भावना में तत्पर हो, सुरत हो, भले प्रकार लीन हो । ऐसा साधु उत्तम स्थान जो लोक-शिखर पर सिद्ध-क्षेत्र तथा मिथ्यात्व आदि चौदह गुणस्थानों से परे शुद्ध-स्वभावरूप मोक्ष-स्थान को पाता है ।