
जचंदछाबडा :
मोक्षपाहुड़ में मोक्ष और मोक्ष के कारण का स्वरूप कहा है और जो मोक्ष के कारण का स्वरूप अन्य प्रकार मानते हैं उनका निषेध किया है, इसलिये इस ग्रंथ के पढ़ने, सुनने से उसके यथार्थ स्वरूप का ज्ञान-श्रद्धान-आचरण होता है, उस ध्यान से कर्म का नाश होता है और इसकी बारंबार भावना करने से उसमें दृढ़ होकर एकाग्र-ध्यान की सामर्थ्य होती है, उस ध्यान से कर्म का नाश होकर शाश्वत सुखरूप मोक्ष की प्राप्ति होती है । इसलिये इस ग्रंथ को पढ़ना-सुनना-निरन्तर भावना रखनी ऐसा आशय है ॥१०६॥ इस प्रकार श्रीकुन्दकुन्द आचार्य ने यह मोक्षपाहुड ग्रंथ संपूर्ण किया । इसका संक्षेप इस प्रकार है कि -- यह जीव शुद्ध दर्शन-ज्ञानमयी चेतना-स्वरूप है तो भी अनादि ही से पुद्गल कर्म के संयोग से अज्ञान मिथ्यात्व, राग-द्वेषादिक विभावरूप परिणमता है इसलिये नवीन कर्म-बंध के संतान से संसार में भ्रमण करता है । जीव की प्रवृत्ति के सिद्धांत मे समान्यरूप से चौदह गुणस्थान निरूपण किये हैं -- इनमें मिथ्यात्व के उदय से मिथ्यात्व गुणस्थान होता है, मिथ्यात्व की सहकारिणी अनंतानुबंधी कषाय है, केवल उसके उदय से सासादन गुणस्थान होता है और सम्यक्त्व-मिथ्यात्व दोनों के मिलापरूप मिश्र-प्रकृति के उदय से मिश्र-गुणस्थान होता है, इन तीन गुणस्थानों में तो आत्म-भावना का अभाव ही है । जब कालादिलब्धि के निमित्त से जीवाजीव पदार्थों का ज्ञान-श्रद्धान होने पर सम्यक्त्व होता है तब इस जीव को अपना और पर का, हित-अहित का तथा हेय-उपादेय का जानना होता है तब आत्मा की भावना होती है तब अविरत नाम चौथा गुणस्थान होता है । जब एकदेश परद्रव्य से निवृत्ति का परिणाम होता है तब जो एकदेश चारित्ररूप पाँचवाँ गुणस्थान होता है उसको श्रावकपद कहते हैं । सर्वदेश परद्रव्य से निवृत्तिरूप परिणाम हो तब सकल-चारित्ररूप छट्ठा गुणस्थान होता है, इसमें कुछ संज्वलन चारित्रमोह के तीव्र उदय से स्वरूप के साधने में प्रमाद होता है, इसलिये इसका नाम प्रमत्त है, यहाँ ये लगाकर ऊपर के गुणस्थानवालों को साधु कहते हैं । जब संज्वलन चारित्रमोह का मंद उदय होता है तब प्रमाद का अभाव होकर स्वरूप के साधने में बड़ा उद्यम होता है तब इसका नाम अप्रमत्त ऐसा सातवाँ गुणस्थान है, इसमें धर्म-ध्यान की पूर्णता है । जब इस गुणस्थान में स्वरूप में लीन हो तब सातिशय अप्रमत्त होता है, श्रेणी का प्रारंभ करता है तब इससे ऊपर चारित्र-मोह का अव्यक्त उदयरूप अपूर्वकरण, अनिवृत्तिकरण, सूक्ष्मसंपराय नाम धारक ये तीन गुणस्थान होते हैं । चौथे से लगाकर दसवें सूक्ष्मसंपराय तक कर्म की निर्जरा विशेषरूप से गुण-श्रेणी रूप होती है । इससे ऊपर मोहकर्म के अभावरूप ग्यारहवाँ, बारहवाँ, उपशांतकषाय, क्षीणकषाय गुणस्थान होते हैं । इसके पीछे शेष तीन घातिया कर्मों का नाशकर अनंत चतुष्टय प्रगट होकर अरहंत होता है यह सयोगी जिन नाम गुणस्थान है, यहाँ योगकी प्रवृत्ति है । योगों का निरोधकर अयोगी जिन नाम का चौदहवाँ गुणस्थान होता है, यहाँ अघातिया कर्मों का भी नाश करके लगता ही अनंतर समय में निर्वाण-पद को प्राप्त होता है, यहाँ संसार के अभाव से मोक्ष नाम पाता है । इस प्रकार सब कर्मों का अभावरूप मोक्ष होता है, इसके कारण सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र कहे, इनकी प्रवृत्ति चौथे गुणस्थान से सम्यक्त्व प्रगट होनेपर एकदेश होती है, यहाँ से लगाकर आगे जैसे-जैसे कर्म का अभाव होता है वैसे-वैसे सम्यग्दर्शन आदि की प्रवृत्ति बढ़ती जाती है और जैसे-जैसे इनकी प्रवृत्ति बढ़ती है वैसे-वैसे कर्म का अभाव होता जाता है, जब घाति कर्म का अभाव होता है तब तेरहवें गुणस्थान में अरहंत होकर जीवन-मुक्त कहलाते हैं और चौदहवें-गुणस्थान के अंत में रत्नत्रय की पूर्णता होती है, इसलिये अघाति कर्म का भी नाश होकर अभाव होता है तब साक्षात् मोक्ष होकर सिद्ध कहलाते हैं । इसप्रकार मोक्ष का और मोक्ष के कारणका स्वरूप जिन-आगम से जानकर और सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र मोक्ष के कारण कहे हैं इनको निश्चय-व्यवहाररूप यथार्थ जानकर सेवन करना । तप भी मोक्ष का कारण है उसे भी चारित्र में अंतर्भूत कर त्रयात्मक ही कहा है । इस प्रकार इन कारणों से प्रथम तो तद्भव ही मोक्ष होता है । जबतक कारण की पूर्णता नहीं होती है उससे पहिले कदाचित् आयुकर्म की पूर्णता हो जाय तो स्वर्ग में देव होता है, वहाँ भी यह वांछा रहती है, यह शुभोपयोग का अपराध है, यहां से चयकर मनुष्य होऊँगा तब सम्यग्दर्शनादि मोक्षमार्ग का सेवनकर मोक्ष प्राप्त करूँगा, ऐसी भावना रहती है तब वहाँ से चयकर मोक्ष पाता है । अभी इस पंचमकाल में द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव की सामग्री का निमित्त नहीं है इसलिये तद्भव मोक्ष नहीं है, तो भी जो रत्नत्रय का शुद्धतापूर्वक पालन करे तो यहाँ से देव पर्याय पाकर पीछे मनुष्य होकर मोक्ष पाता है । इसलिये यह उपदेश है -- जैसे बने वैसे रत्नत्रय की प्राप्ति का उपाय करना, इसमें भी सम्यग्दर्शन प्रधान है इसका उपाय तो अवश्य चाहिये इसलिये जिनागम को समझकर सम्यक्त्व का उपाय अवश्य करना योग्य है, इसप्रकार इस ग्रंथ का संक्षेप जानो । |