
जचंदछाबडा :
ये पाँच पद आत्मा ही के हैं,
आत्मा का निश्चय-व्यवहारात्मक तत्त्वार्थ-श्रद्धानरूप परिणाम सम्यग्दर्शन है, संशय विमोह विभ्रम से रहित और निश्चय-व्यवहार से निजस्वरूप का यथार्थ जानना सम्यग्ज्ञान है, सम्यग्ज्ञान से तत्त्वार्थों को जानकर रागद्वेषादि के रहित परिणाम होना सम्यक्चारित्र है, अपनी शक्ति अनुसार सम्यग्ज्ञानपूर्वक कष्टका आदर कर स्वरूप का साधना सम्यक्तप है, इस प्रकार ये चारों ही परिणाम आत्मा के हैं, इसलिये आचार्य कहते हैं कि मेरे आत्मा ही का शरण है, इसीकी भावना में चारों आ गये । अंतसल्लेखना में चार आराधना का आराधन कहा है, सम्यग्दर्शन ज्ञान चारित्र तप इन चारों का उद्योत, उद्यवन, निर्वहण, साधन और निस्तरण ऐसे पंचप्रकार आराधना कही है, वह आत्मा को भाने में (--आत्मा की भावना--एकाग्रता करने में) चारों आगये, ऐसे अंत सल्लेखना की भावना इसी में आ गई ऐसे जानना तथा आत्मा ही परम मंगलरूप है ऐसा भी बताया है ॥१०५॥ |