+ फिर कहते हैं -
दंसणणाणचरित्ते उवहाणे जइ ण लिंगरूवेण
अट्टं झायदि झाणं अणंतसंसारिओ होदि ॥8॥
दर्शनज्ञानचारित्राणि उपधानानि यदि न लिंगरूपेण
आर्त्तं ध्यायति ध्यानं अनंतसंसारिकः भवति ॥८॥
जिनलिंगधर भी ज्ञान-दर्शन-चरण धारण ना करें ।
वे आर्तध्यानी द्रव्यलिंगी नंत संसारी कहे ॥८॥
अन्वयार्थ : [जइ] यदि [लिंगरूवेण] लिंगरूप करके [दंसणणाणचरित्ते] दर्शन ज्ञान चारित्र को तो [उवहाणे] उपधान-रूप [ण] नहीं किये (धारण नहीं किये) और [अट्टं झायदि झाणं] आर्त्तध्यान को ध्याता है तो [अणंतसंसारिओ] अनन्त-संसारी [होदि] होता है ।

  जचंदछाबडा 

जचंदछाबडा :

लिंग धारण करके दर्शन ज्ञान चारित्र का सेवन करना था वह तो नहीं किया और परिग्रह कुटुम्ब आदि विषयों का परिग्रह छोडा़ उसकी फिर चिंता करके आर्त्तध्यान ध्याने लगा तब अनंतसंसारी क्यों न हो ? इसका यह तात्पर्य है कि -- सम्यग्दर्शनादिरूप भाव तो पहिले हुए नहीं और कुछ कारण पाकर लिंग धारण कर लिया, उसकी अवधि क्या ? पहिले भाव शुद्ध करके लिंग धारण करना युक्त है ॥8॥