
जचंदछाबडा :
गृहस्थपद छोड़कर शुभभाव बिना लिंगी हुआ था, इसके भाव की भावना मिटी नहीं तब लिंगी का रूप धारण करके भी गृहस्थों के कार्य करने लगा, आप विवाह नहीं करता है तो भी गृहस्थों के संबंध कराकर विवाह कराता है तथा खेती, व्यापार जीवहिंसा आप करता है और गृहस्थोंको कराता है, तब पापी होकर नरक जाता है । ऐसे भेष धारने से तो गृहस्थ ही भला था, पद का पाप तो नहीं लगता, इसलिये ऐसे भेष धारण करना उचित नहीं है यह उपदेश है ॥9॥ |