
दंसणणाणचरित्ते तवसंजमणियमणिच्चकम्मम्मि
पीडयदि वट्टमाणो पावदि लिंगी णरयवासं ॥11॥
दर्शनज्ञान चारित्रेषु तपः संयमनियमनित्यकर्मसु
पीड्यते वर्तमानः प्राप्नोति लिंगी नरकवासम् ॥११॥
ज्ञान-दर्शन-चरण तप संयम नियम पालन करें ।
पर दु:खी अनुभव करें तो जावें नियम से नरक में ॥११॥
अन्वयार्थ : [दंसणणाणचरित्ते] दर्शन ज्ञान चारित्र में, [तव] तप, [संजम] संयम, [णियम] नियम [णिच्चकम्मम्मि] नित्य-कर्म अर्थात् आवश्यक आदि क्रिया, इन क्रियाओं को करता हुआ [वट्टमाणो] वर्तमान में [पीडयदि] दुःखी होता है वह लिंगी [णरयवासं] नरकवास [पावदि] पाता है ।
जचंदछाबडा
जचंदछाबडा :
लिंग धारण करके ये कार्य करने थे, इनका तो निरादर करे और प्रमाद सेवे, लिंग के योग्य कार्य करता हुआ दुःखी हो, तब जानो कि इसके भावशुद्धिपूर्वक लिंगग्रहण नहीं हुआ और भाव बिगड़ने पर तो उसका फल नरक ही होता है, इस प्रकार जानना ॥11॥
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