+ जो भोजन में भी रसों का लोलुपी होता है वह भी लिंग को लजाता है -
कंदप्पाइय वट्टइ करमाणो भोयणेसु रसगिद्धिं
मायी लिंगविवाई तिरिक्खजोणी ण सो समणो ॥12॥
कंदर्पादिषु वर्तते कुर्वाणः भोजनेषु रसगृद्धिम्
मायावी लिंगव्यवायी तिर्यग्योनिः न सः श्रमणः ॥१२॥
कन्दर्प आदि में रहें अति गृद्धता धारण करें ।
हैं छली व्याभिचारी अरे ! वे श्रमण नहिं तिर्यंच हैं ॥१२॥
अन्वयार्थ : जो लिंग धारण करके [भोयणेसु] भोजन में भी [रसगिद्धिं] रस की गृद्धि अर्थात् अति आसक्तता को [करमाणो] करता रहता है वह [कंदप्पाइय] कंदर्प आदिक में [वट्टइ] वर्तता है, [मायी] मायवी अर्थात् कामसेवन के लिये अनेक छल करना विचारता है, [लिंगविवाई] लिंग को दूषित करता है [सो] वह [तिरिक्खजोणी] तिर्यंचयोनि है, [ण सो समणो] श्रमण नहीं है ।

  जचंदछाबडा 

जचंदछाबडा :

गृहस्थपद छोड़कर आहार में लोलुपता करने लगा तो गृहस्थपद में अनेक रसीले भोजन मिलते थे, उनको क्यों छोड़े ? इसलिये ज्ञात होता है कि आत्मभावना के रसको पहिचाना ही नहीं है इसलिये विषयसुख की ही चाह रही तब भोजन के रसकी, साथ के अन्य भी विषयों की चाह होती है तब व्यभिचार आदि में प्रवर्तकर लिंग को लजाता है, ऐसे लिंग से तो गृहस्थपद ही श्रेष्ठ है ऐसे जानना ॥12॥