
वारि एक्कम्मि य जम्मे मरिज्ज विसवेयणाहदो जीवो
विसयविसपरिहयाणं भमंति संसारकंतारे ॥22॥
वारे एकस्मिन् च जन्मनि गच्छेत् विषवेदनाहत: जीव:
विषयविषपरिहता भ्रमन्ति संसारकान्तारे ॥२२॥
बस एक भव का नाश हो इस विषम विष के योग से ।
पर विषयविष से ग्रसितजन चिरकाल भववन में भ्रमें ॥२२॥
अन्वयार्थ : [विसवेयणाहदो] विष की वेदना से नष्ट [जीवो] जीव तो एक [जम्मे] जन्म में [एक्कम्मि] एक [वारि] बार ही ही [मरिज्ज] मरता है परंतु [विसयविसपरिहया] विषय-रूप विष से नष्ट जीव अतिशयता / बारबार [संसारकंतारे] संसार-रूपी वन में [भमंति] भ्रमण करते हैं ।
जचंदछाबडा
जचंदछाबडा :
अन्य सर्पादिक के विष से विषयों का विष प्रबल है, इनकी आसक्ति से ऐसा कर्मबंध होता है कि उससे बहुत जन्म मरण होते हैं ॥२२॥
|