
णरएसु वेयणाओ तिरिक्खए माणवेसु दुक्खाइं
देवेसु वि दोहग्गं लहंति विसयासिया जीवा ॥23॥
नरकेषु वेदना: तिर्यक्षु मानुषेषु दु:खानि
देवेषु अपि दौर्भाग्यं लभन्ते विषयासक्ता जीवा: ॥२३॥
अरे विषयासक्त जन नर और तिर्यग् योनि में ।
दु:ख सहें यद्यपि देव हों पर दु:खी हों दुर्भाग्य से ॥२३॥
अन्वयार्थ : [विसयासिया] विषयों में आसक्त [जीवा] जीव [णरएसु] नरक में अत्यंत [वेयणाओ] वेदना पाते हैं, [तिरिक्खए] तिर्चंचों में तथा [माणवेसु] मनुष्यों में [दुक्खाइं] दुःखों को पाते हैं और [देवेसु] देवों में उत्पन्न हों वहाँ [वि] भी [दोहग्गं] दुर्भाग्यपना [लहंति] पाते हैं ।
जचंदछाबडा
जचंदछाबडा :
विषयासक्त जीवों को कहीं भी सुख नहीं है, परलोक में तो नरक आदिक के दु:ख पाते ही हैं, परन्तु इस लोक में भी इनके सेवन करने में आपत्ति व कष्ट आते ही हैं तथा सेवन से आकुलता; दु:ख ही है, यह जीव भ्रम से सुख मानता है, सत्यार्थ ज्ञानी तो विरक्त ही होता है ॥२३॥
|