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रसना इन्द्रिय पर जय
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सीदलमसीदलं वा सुक्कं लुक्खं सिणिद्ध सुद्धं वा ।
लोणिदमलोणिदं वा भुंजंति मुणी अणासादं ॥816॥
अन्वयार्थ :
ठंडा हो या गरम, सूखा हो या रुखा, चिकनाई हो या रहित, लवण सहित हो या रहित-ऐसे स्वाद रहित आहार को मुनि ग्रहण करते हैं ।