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'यमन' शब्द का अर्थ
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ट्ठक्खोमक्खणमेत्तं भुंजंत्ति मुणी पाणाधारणणिमितं ।
पाणं धम्मणिम्मिं धम्मं पि चरंति मोक्खट्ठं ॥817॥
अन्वयार्थ :
मुनि धुरे में ओंगन देने मात्र के सदृश, प्राणों के धारण हेतु आहार करते हैं-प्राणों को धर्म के लिए और धर्म को भी मोक्ष के लिए आचरते हैं ।