
वसुधम्मि वि विहरंता पिंड ण करेंति कस्सइ कयाई ।
जीवेसु दयावण्णा माया जह पुत्तभंडेसु ॥800॥
अन्वयार्थ : गोचरीकृत से चर्या करके वे मुनि आहार ग्रहण करते हैं, पुन: आकर प्रतिक्रमण करते हैं, अर्थात् दोष परिहार के लिए क्रियाकलाप करते हैं । यद्यपि कृत-कारित-अनुमोदना से रहित आहार मिला है फिर भी उसके लिए वे यति अतीव शुद्धि करते हैं । वे दिन में एक बार ही आहार लेने से परिमित एक आहारी हैं । पुन: उपवास करके अथवा एक स्थान में पारणा करते हैं ।