
ते लद्धणाणचक्खू णाणुज्जोएण दिट्ठपरमट्ठा ।
णिस्संकिदणिव्विदिगिंछादबलपरक्कमा साहू ॥830॥
अणुबद्ध तवोकम्मा खवणवसगदा तवेण तणुअंगा ।
धीरा गुणगंभीरा अभग्गजोगा य दिढचरित्ताय य ॥831॥
आलीणगंडमंसा पायडभिउडीमुहा अहियदच्छा ।
सवणा तवं चरंता उक्किण्णा धम्मलच्छीए ॥832॥
अन्वयार्थ : वे ज्ञानचक्षु को प्राप्त हुए साधु ज्ञान-प्रकाश के द्वारा परमार्थ को देखने वाले नि:शंकित, निर्विचिकित्सा और आत्मबल पराक्रम से सहित होते हैं । जो तप करने में तत्पर हैं, उपवास के वशीभूत हैं, तप से कृशशरीरी हैं, धीर हैं, गुणों से गम्भीर हैं, योग का भंग नहीं करते हैं और दृढ़ चारित्रधारी हैं । तथा जिनके कपोल का मांस सूख गया है, भ्रकुटी और मुख प्रकट हैं, आँख के तारे चमक रहे हैं, ऐसे श्रमण तपश्चर्या करते हुए धर्मलक्ष्मी से संयुक्त हैं ।