
अवगदमाणत्थंभा अणुस्सिदा अगव्विदा अचंडा य ।
दंता मद्दवजुत्ता समयविदण्हू, विणीदा य ॥836॥
उवलद्धपुण्णपावा जिणसासणगहिद मुणिदपज्जाला ।
करचरणसंवुडंगा झाणुवज्जुत्ता मुणी होंति ॥837॥
अन्वयार्थ : मानरूपी स्तम्भ से रहित, उत्सुकता रहित, गर्व रहित, क्रोध रहित, इन्द्रियजित्, मार्दव सहित, आगम के ज्ञानी, विनयगुण सहित, पुण्यपाप के ज्ञाता, जिनशासन को स्वीकार करने वाले, द्रव्य के स्वरूप को जानने वाले, हाथ-पैर तथा शरीर को नियन्त्रित रखने वाले, ध्यान से उपयुक्त ऐसे मुनिराज का ज्ञानमद दूर होता है ।