
ते छिण्णणेहबंधा णिण्णेहा अप्पणो सरीरम्मि ।
ण करंति किंचि साहू परिसंठप्पं सरीरम्मि ॥838॥
अन्वयार्थ : शरीर संस्कार का त्याग, बन्धु आदि का त्याग, सर्व संग का त्याग, राग का अभाव इसका नाम उज्झन शुद्धि है । स्नेह बंध का भेदन करने वाले, अपने शरीर में भी ममता रहित वे साधु शरीर का किंचित् भी संस्कार नहीं करते हैं ।