
एदं सरीरमसुई णिच्चं कलिकलुसभायणमचोक्खं ।
छाइद ढिड्ढिस खिब्भिसभरिदं अमेज्झघरं ॥846॥
वसमज्जमंस सोणिय पुप्फस कालेज्जसिंभसीहाणं ।
सिरजाल अट्ठिसंकड चम्में णद्धं सरीरघरं ॥847॥
बीभच्छं विच्छुइयं थूहायसुसाणवच्च मुत्ताणं ।
अंसूयपूयलसियं पयलियलालाउलमचोक्खं ॥848॥
काय मलमत्थुलिंगं दंतमल विचिक्कणं गलिदसेदं ।
किमिजंतुदोसभरिदं सेंदणियाकद्दमसरिच्छं ॥849॥
अन्वयार्थ : यह शरीर अपवित्र है नितय ही कलि कलुष का पात्र है, अशुभ है, इसका अन्र्तभाग ढ़का हुआ है, कपास के ढ़ेर के समान है, घृणित पदार्थों से भरा हुआ है और विष्ठा का घर है । वसा, मज्जा, मांस, खून, फुफ्फुस, कलेजा, कफ, नाकमल, शिराजाल और हड्डी इनसे व्याप्त है । यह शरीर रूपी गृह चर्म से ढका हुआ है । घृणित, थूक, नाकमल, विष्ठा, मूत्र, अश्रु, पीव, चक्षुमल से युक्त, टपकती हुई लार से व्याप्त यह शरीर अशुभ है । काय का मल, सिर का मल, दाँत का मल, चक्षु का मल, झरता हुआ पसीना-इनसे युक्त कृमि जन्तुओं से भरित गड्ढें की कीचड़ के समान यह शरीर है ।