
रोगाणं आयदणं वाधि सदसमुच्छिदं सरीरघरं ।
धीरा खणमवि रागं ण करेंति मुणी सरीरम्मि ॥845॥
अन्वयार्थ : सैकड़ों व्याधियों से व्याप्त शरीर रूपी घर रोगों का स्थान है । वे धीर मुनि इस शरीर में क्षण मात्र के लिए राग नहीं करते हैं अत: उनका प्रतिकार नहीं करते हैं ।