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लौकिक कथा का निषेध
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अच्छीहिंय पेच्छंता कण्णेहिंय बहुविहाइं सुणमाण ।
अत्थंति मूयभूया ण ते करेंति हु लोइयकहाओ ॥856॥
अन्वयार्थ :
वे मुनि नेत्रों से देखते हुए अैर कानों से बहुत पुकार को सुनते हुए भी मूक के समान रहते हैं किन्तु लौकिक कथाएँ नहीं करते हैं ।