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ध्यान हेतु परकोटे सहित नगर की रचना
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रागो दोसो मोहो इंदियचोरा य उज्जदा णिच्चं ।
ण च यंति पहंसेदुं सप्पुरिससुरक्खियं णयरं ॥880॥
अन्वयार्थ :
राग, द्वेष, मोह और उद्यत हुए इन्द्रियरूपी चोर हमेशा ही सत्पुरुषों से रक्षित तपरूपी नगर को नष्ट करने में कभी भी समर्थ नहीं होते हैं ।