+ उसी प्रकार से और भी -
धिदिधणिदणिच्छिदमदी चरित्त पायार गोउरं तुंगं ।
खंतीसुकदकवाडं तवणयरं संजमारक्खं ॥879॥
अन्वयार्थ : धैर्य से अतिशय निश्चित विवेकरुपी परकोटा है, चारित्ररुपी ऊँचे गोपुर (कूट) हैं, क्षमा और धर्म ये युगल फाटक हैं और संयम जिसका कोतवाल है, ऐसा यह मुनियों का तपरूपी नगर है ।