+ आस्रव के दो प्रकार -
कम्मं पुण्णं पावं हेउं तेसिं च होंति सच्छिदरा
मंद-कसाया सच्छा तिव्व-कसाया असच्छा हु ॥90॥
अन्वयार्थ : [कम्‍मं पुण्‍णं पावं] कर्म पुण्‍य और पाप के भेद से दो प्रकार का है [च तेसिं हेउं सच्छिदरा होंति] और उनके कारण भी सत् (प्रशस्‍त) इतर (अप्रशस्‍त) दो ही होते हैं [मंदकमाया मच्‍छा] उनमें मंद-कषाय परिणाम तो प्रशस्‍त (शुभ) है [तिव्‍वकमाया असच्‍छाहु] और तीव्र-कषाय परिणाम अप्रशस्‍त (अशुभ) है ।

  छाबडा 

छाबडा :

सातावेदनीय, शुभ-आयु, उच्‍च-गोत्र और शुभ-नाम ये चार प्रकृतियाँ तो पुण्‍यरूप हैं बाकी चार घातिया कर्म, असातावेदनीय, नरकायु, नीचगोत्र और अशुभनाम ये चार प्रकृतियाँ पापरूप हैं । उनके कारण आस्रव भी दो प्रकार के हैं । मंद-कषायरूप परिणाम तो पुण्‍यास्रव हैं और तीव्र-कषायरूप परिणाम पापास्रव हैं ।

अब मंद-तीव्र-क‍षाय को प्रगट दृष्‍टान्‍त पूर्वक कहते हैं -