+ मोह से आस्रव -
मोह-विवाग-वसादो जे परिणामा हवंति जीवस्स
ते आसवा मुणिज्जसु मिच्छत्ताई अणेय-विहा ॥89॥
अन्वयार्थ : [मोहविवागवसोदो] मोह के उदय से [जे परिणामा] जो परिणाम [जीवस्‍स] इस जीव के [हवंति] होते हैं [ते आसवा] वे ही आस्रव हैं [मुणिज्‍जसु] हे भव्‍य । तू प्रत्‍यक्षरूप से ऐसे जान [मिच्‍छत्‍ताई अणेयविहा] वे परिणाम मिथ्‍यात्‍व को आदि लेकर अनेक प्रकार के हैं ।

  छाबडा 

छाबडा :

कर्मबन्‍ध के कारण आस्रव है। वे मिथ्‍यात्‍व, अविरत, प्रमाद, कषाय और योग के भेद से पाँच प्रकार के हैं । उनमें स्थिति, अनुभागरूप बन्‍ध के कारण मिथ्‍यात्‍वादिक चार ही है सो ये मोह के उदय से होते हैं और जो योग हें वे समय-मात्र बन्‍ध को करते हैं, कुछ भी स्थिति अनुभाग को नहीं करते हैं इसलिये बन्‍ध के कारण में प्रधान नहीं हैं । अब पुण्‍य-पाप के भेद से आस्रव को दो प्रकार का कहते हैं -