
अप्प-पंससण-करणं पुज्जेसु वि दोस-गहण-सीलत्तं
वेर -धरणं च सुइरं तिव्व कसायाण लिंगाणि ॥92॥
अन्वयार्थ : [अप्पपसंसण करणं] अपनी प्रशंसा करना [पुज्जेसु वि दोसगहणसीलत्तं] पूज्य पुरूषों में भी दोष ग्रहण करने का स्वभाव [च सुइरं वेरधरणं] और बहुत समय तक बैर धारण करना [तिव्वकसायाण लिंगाणि] ये तीव्र-कषाय के चिन्ह हैं ।
छाबडा
छाबडा :
अब कहते हैं कि ऐसे जीव के आस्रव का चिंतवन निष्फल है -
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