+ आस्रव को हे जानकर त्यागने की प्रेरणा -
एवं जाणंतो वि हु परिचयणीये वि जो ण परिहरइ ।
तस्सासवाणुवेक्खा सव्वा वि णिरत्थया होदि ॥93॥
अन्वयार्थ : [एवं जाणंतो वि हु] इस प्रकार से प्रत्‍यक्षरूप से जानता हुआ भी [परिचयणीये वि जो ण परिहरइ] जो त्‍यागने योग्‍य परिणामों को नहीं छोड़ता है [तस्‍स] उसके [सव्‍वा वि] सब ही [आसवाणुवक्‍खा] आस्रव का चिंतवन [णिरत्‍थया होदि] निरर्थक है ।

  छाबडा 

छाबडा :

आस्रवानुप्रेक्षा को चिंतवन कर‍के पहिले तो
  • तीव्र-कषाय छोड़ना चाहिए फिर
  • शुद्ध आत्‍म-स्‍वरूप का ध्‍यान करना चाहिए,
  • सब कषाय छोड़ना चाहिये
तब तो यह चिंतवन सफल है केवल वार्ता करना मात्र ही सफल नहीं हैं ।