
उवसम-भाव-तवाणं जह जह वड्ढी हवेइ साहूणं
तह तह णिज्जर-वड्ढी विसेसदो धम्म-सुक्कादो ॥105॥
अन्वयार्थ : [साहूणं] मुनियों के [जह जह] जैसे-जैसे [उवसमभावतवाणं] उसशमभाव तथा तप की [वड्ढी हवेइ] बढुवारी होती है [तह तह णिज्जर वड्ढी] वैसे-वैसे ही निर्जरा की बढवारी होती है [धम्मसुक्कादो] धर्मध्यान और शुक्लध्यान से [विसेसदो] विशेषता से बढ़वारी होती है ।
छाबडा
छाबडा :
अब इस वृद्धि के स्थानों को बतलाते हैं -
|