
छाबडा :
निर्जरा दो प्रकार है । कर्म अपनी स्थिति को पूर्ण कर उदय होकर रस देकर खिर जाते है सो सविपाक निर्जरा कहलाती है, यह निर्जरा तो सब ही जीवों के होती है और तप के कारण कर्म-स्थिति पूर्ण हुए बिना ही खिर जाते है वह अविपाक निर्जरा कहलाती है, यह व्रतधारियों के होती है । अब निर्जरा किससे बढ़ती हुई होती है सो कहते हैं- |