+ निर्जरा के दो प्रकार -
सा पुण दुविहा णेया सकाल-पत्ता तवेण कयमाणा
चदुगदीण पढमा वय-जुत्ताणं हवे बिदिया ॥104॥
अन्वयार्थ : [सा पुण दुविहा णेया] वह पहिले कही हुई निर्जरा दो प्रकार की है [सकालपत्ता] एक तो स्‍वकाल प्राप्‍त [तवेण कयमाणा] दूसरी तप द्वारा की गई [चादुगदीणं पढमा] उनमें पहली स्‍वकाल-प्राप्‍त निर्जरा तो चतुर्गति के जीवों के होती है [वयुजुत्ताणं हवे बिदिया] दूसरी व्रत-युक्त (तप) के होती है ।

  छाबडा 

छाबडा :

निर्जरा दो प्रकार है । कर्म अपनी स्थिति को पूर्ण कर उदय होकर रस देकर खिर जाते है सो सविपाक निर्जरा कहलाती है, यह निर्जरा तो सब ही जीवों के होती है और तप के कारण कर्म-स्थिति पूर्ण हुए बिना ही खिर जाते है वह अविपाक निर्जरा कहलाती है, यह व्रतधारियों के होती है ।

अब निर्जरा किससे बढ़ती हुई होती है सो कहते हैं-