+ अधिक निर्जरा के उपाय -
जो विसहदि दुव्वयणं साहम्मिय हीलणं च उवसग्गं
जिणिऊण कसाय-रिउं तस्स हवे णिज्जरा विउला ॥109॥
अन्वयार्थ : जो [दुव्‍वयणं] दुर्वचन [सहदि] सहता है [साहम्मियहीलणं] साधर्मी (जो अन्‍य मुनि आदिक) द्वारा किये गये अनादर को सहता है [च उवसग्‍गं] तथा (देवादिकों से किये गये) उपसर्ग को सहता है [कसायरिउं] कषायरूप बैरी को [जिणऊण] जीत कर जो ऐसे करता है [तस्‍स] उसके [विउला] विपुल [बड़ी] [णिज्‍जरा] निर्जरा [हवे] होती है ।

  छाबडा 

छाबडा :

कोई कुवचन कहे तो उससे कषाय न करे तथा अपने को अतीचारदिक (दोष) लगे तब आचार्यादि कठोर वचन कह कर प्रायश्चित देवें, निरादार करें तो उसको कषाय-रहित होकर सहे तथा कोई उपसर्ग करे तो उससे कषाय न करे उसके बड़ी निर्जरा होती है ।