
छाबडा :
जैसे किसी को ऋणके रूपये देने होवे तो जब वह माँगे तब देना पड़े उसमें व्याकुलता कैसी ? ऐसा विचार कर जो उपसर्ग और परिषह को शान्त परिणामों से सह लेता है उसके बहुत निर्जरा होती है । शरीर को मोह का कारण, अस्थिर तथा अशुचि माने तब इसकी चिन्ता नहीं रहती । अपने स्वरूप में लगे तब निर्जरा होवे ही होवे । |