+ विज्ञानघन निर्ममत्व आत्म-सम्मुख के निर्जरा -
रिण-मोयणं व मण्णइ जो उवसग्गं परीसहं तिव्वं
पाव-फलं मे एदं मया वि जं संचिदं पुव्वं ॥110॥
जो चिंतेइ सरीरं ममत्त-जणयं विणस्सरं असुइं
दंसण-णाण-चरित्तं सुह-जणयं णिम्मलं णिच्चं ॥111॥
अन्वयार्थ : [जो] जो [उवसग्‍गं] उपसर्ग को तथा [तिव्‍वं] तीव्र [परीसहं] परिषह को [रिणमोयणं व मण्‍णइ] ऋण (कर्ज) की तरह मानता है कि [एदे] ये [मया वि जं पुव्‍वं संचि‍दं] मेरे द्वारा पूर्व-जन्‍म में संचित किये गये [पावफलं] पाप-कर्मों का फल है । [जो] जो [सरीरं] शरीर को [ममत्तजणयं] ममत्‍व [मोह] को उत्‍पन्‍न करानेवाला [विणस्‍सरं] विनाशीक [असुइं] तथा अपवित्र [चिंतेइ] मानता है और [सुहजणयं] सुख को उत्‍पन्‍न करनेवाले [णिम्‍मलं] निर्मल [णिच्‍चं] तथा नित्‍य [दंसणणाणचरित्तं] दर्शनज्ञान-चारित्ररूपी आत्‍मा का [चिंतेइ] चिंतवन [ध्‍यान] करता है उसके बहुत निर्जरा होती है ।

  छाबडा 

छाबडा :

जैसे किसी को ऋणके रूपये देने होवे तो जब वह माँगे तब देना पड़े उसमें व्‍याकुलता कैसी ? ऐसा विचार कर जो उपसर्ग और परिषह को शान्‍त परिणामों से सह लेता है उसके बहुत निर्जरा होती है । शरीर को मोह का कारण, अस्थिर तथा अशुचि माने तब इसकी चिन्‍ता नहीं रहती । अपने स्‍वरूप में लगे तब निर्जरा होवे ही होवे ।