+ उपसंहार -
जो सम-सोक्ख -णिलीणो वारंवारं सरेइ अप्पाणं
इंदिय-कसाय-विजई तस्स हवे णिज्जरा परमा ॥114॥
अन्वयार्थ : जो मुनि समतारूपी सुख में लीन हुआ, बार-बार आत्‍मा का स्‍मरण करता है, इन्द्रियों और कषायों को जीतने वाले उसी साधु के उत्‍कृष्‍ट निर्जरा होती है ।

  छाबडा 

छाबडा :

जो मुनि समता-रस में लीन हुआ, बार-बार आत्मा का स्मरण करता है, इन्द्रिय और कषाय जीतनेवाले उसी के उत्कृष्ट निर्जरा होती है ।