+ लोक-अनुप्रेक्षा का स्वरूप -
सव्वायासमणंतं तस्स य बहु-मज्झ-संठि ओ लोओ
सो केण वि णेव कओ ण य धरिओ हरि-हरादीहिं ॥115॥
अन्वयार्थ : यह समस्‍त आकाश अनन्‍त-प्रदेशी है । उसके ठीक मध्‍य में भले प्रकार से लोक स्थित है । उसे किसी ने बनाया नहीं है, और न हरि / हर वगैरह उसे धारण ही किये हुए हैं ।

  छाबडा