+ गर्भज, सम्मूर्छन, भोग-भूमिज -
ते वि पुणो वि य दुविहा गब्भज-जम्मा तहेव संमुच्छा
भोग- भवुा गब्भ-भवुा थलयर-णह -गामिणो सण्णी ॥130॥
अन्वयार्थ : [ते वि पुणो वि य दुविहा गब्भज-जम्मा तहेव संमुच्छा] वे छह प्रकार के तिर्यञ्च, गर्भज और सम्मूर्च्छन के भेद से दो-दो प्रकार के हैं, [भोग- भवुा गब्भ-भवुा थलयर-णह -गामिणो सण्णी] इनमें जो भोगभूमि के तिर्यञ्च हैं, व थलचर, नभचर ही हैं, जलचर नहीं हैं और सैनी ही हैं, असैनी नहीं हैं ।

  छाबडा