
अट्ठ वि गब्भज दुविहा तिविहा संमुच्छिणो वि तेवीसा
इदि पणसीदी भेया सव्वेसिं होंति तिरियाणं ॥131॥
अन्वयार्थ : [अट्ठ वि गब्भज दुविहा] गर्भज के आठ भेद, ये पर्याप्त और अपर्याप्त के भेद से सोलह हुए; [तेवीसा सम्मुच्छिणो वि तिविहा] सम्मूर्छन के तेईस भेद, ये पर्याप्त, अपर्याप्त और लब्ध्यपर्याप्त के भेद से उनहत्तर हुए; [इदि सव्वेसिं तिरियाणं पणसीदी भेया होंति] इस प्रकार से सब तिर्यञ्चों के पिच्यासी भेद होते हैं ।
छाबडा