पंच-सया धणु-छेहा सत्तम-णरए हवंति णारइया
तत्तो उस्सेहेण य अद्धद्धा होंति उवरुवरिं ॥168॥
अन्वयार्थ : [सत्तमणरए] सातवें नरक में [णारइया] नारकी जीवों का शरीर [पंचसयाधणुछेहा] पाँच सौ धनुष ऊँचा [हवंति] है [ततो उस्सेहेण य उवरुवरि अद्वद्धा होंति] उसके ऊपर शरीर की ऊँचाई आधी आधी है (छ्ट्ठे में दोसौ पचास धनुष, पांचवें में एकसौ पच्चीस धनुष, चौथे में साढ़े बासठ धनुष, तीसरे में सवा इकतीस धनुष, दूसरे में पन्द्रह धनुष दस आना, पहिले में सात धनुष तेरह आना इस तरह जानना चाहिये; इनमें उनचास (49) पटल है उनमें न्यारी-न्यारी विशेष अवगाहना त्रिलोकसारसे जानना चाहिये)

  छाबडा