
वारस-जोयण संखो कोस -तियं गोब्भिया समुद्दिट्ठा
भमरो जोयणमेगं सहस्स संमुच्छिमो मच्छो ॥167॥
अन्वयार्थ : [वायसजोयण संखो] द्वीन्द्रियों में शंख बड़ा है उसकी उत्कृष्ट अवगाहना बारह योजन लम्बी है [कोसतियं गोब्भिया समुदिट्ठा] त्रीन्द्रियों में गोभिका बड़ा है उसकी उत्कृष्ट अवगाहना तीन कोस लम्बी है [भमरो जोयणमेगं] चतुरिन्द्रियों में बड़ा भ्रमर है उसकी उत्कृष्ट अवगाहना एक योजन लम्बी है [सहस्स सम्मुच्छिमो मच्छो] पंचेन्द्रियों में बड़ा मच्छ है उसकी उत्कृष्ट अवगाहना हजार योजन लम्बी है ।
छाबडा