दुग-दु-चदु-चदु-दुग-कप्प-सुराणं सरीर-परिमाणं
सत्तच्छ -पंच-हत्था चउरो अद्धद्ध-हीणा य ॥170॥
हिट्ठिम-मज्झिम-उवरिम-गेवज्जे तह विमाण चउदसए
अद्ध-जुदा वे हत्था हीणं अद्धद्धयं उवरिं ॥171॥
अन्वयार्थ : [दुगद्गचदुचदुदुगदुगकप्पसुराणं सरीरपरिमाणं] दो (सौधर्म, ईशान) दो (सानत्कुमार, माहेन्द्र) चार (ब्रह्म, ब्रह्मोत्तर, लान्तव, कापिष्ठ) चार (शुक्र, महाशुक्र, सतार, सहस्रार) दो (आनत, प्राणत) दो (आरण, अच्युत) युगलों के देवों का शरीर क्रम से [सत्तछहपंचहत्था चउरो अद्धद्ध हीणा य] सात हाथ, छह हाथ, पाँच हाथ, चार हाथ, साढ़े तीन हाथ, तीन हाथ ऊँचा है [हिडिममझिमउवरिमगेवज्मे तह विमाणचउदसए] अधो ग्रैवेयक में, मध्यम ग्रैवेयक में, ऊपर के ग्रैवेयक में, नव अनुदिश तथा पांच अनुत्तर में क्रम से [अद्धजुदा वे हत्था हीणं अद्धद्धयं उवरिं] आधा-आधा हाथ हीन अर्थात् ढाई हाथ, दो हाथ, डेढ हाथ और एक हाथ देवों के शरीर की ऊँचाई है ।

  छाबडा